Bismillah-Hir-Rahman-Nir-Rahim

Assalamu Alaykum doston


आज की दुनिया में जब हम अपने चारों ओर देखते हैं, तो पाते हैं कि इंसान धर्म, परंपराओं और हजारों तरह की कहानियों में उलझ गया है। कोई कुछ कहता है, कोई कुछ। इस शोर में अक्सर हम उस बुनियादी सच्चाई को भूल जाते हैं जो सबसे साफ और सीधी है।

​1. खुदा एक है: यह सबसे बड़ा तर्क (Logic) है

​ज़रा सोचिए, अगर एक छोटे से दफ़्तर या स्कूल को चलाने के लिए दो मालिक हों, तो वहां अफरा-तफरी मच जाएगी। तो फिर इस विशाल कायनात (Universe) को चलाने वाले दो या तीन कैसे हो सकते हैं?

​सूरज का वक्त पर निकलना, समंदर की लहरों का एक अनुशासन में रहना और इंसानी शरीर की जटिल बनावट—ये सब इस बात की गवाही देते हैं कि इस पूरी मशीनरी को चलाने वाला एक ही इंजीनियर (मालिक) है। वह बेनयाज़ है, उसे किसी की ज़रूरत नहीं, बल्कि हम सबको उसकी ज़रूरत है।

​2. उलझनों से दूर, सादगी के करीब

​अक्सर धर्म के नाम पर ऐसी बातें पेश की जाती हैं जो हमारी अक्ल को नहीं भातीं। लेकिन खुदा ने हमें 'अक्ल' इसीलिए दी है ताकि हम सही और गलत में फर्क कर सकें।

​जो सत्य होता है, वह कभी उलझा हुआ नहीं होता।

​जो एक है, उसे समझना सबसे आसान है।

​जब हम 'एक खुदा' को मान लेते हैं, तो हमारे दिल से दुनिया का हर डर निकल जाता है। हमें पता होता है कि हमें सिर्फ उसी को जवाब देना है और उसी से मांगना है।

​3. इंसानियत: एक मालिक के बंदे

​जब मालिक एक है, तो उसकी बनाई हुई मखलूक (इंसान) भी एक ही परिवार की तरह है। ऊंच-नीच, जात-पात और भेदभाव ये सब इंसानों के बनाए हुए जाल हैं। 'एक खुदा' का नज़रिया हमें सिखाता है कि:

​किसी गोरे को काले पर और किसी अमीर को गरीब पर कोई बढ़त हासिल नहीं है।

​श्रेष्ठ वही है जिसके अमल (काम) अच्छे हैं।

​हमारा संदेश

​हन्ज़ला फाउंडेशन का मानना है कि हमें अपनी सोच को तार्किक बनाना होगा। हमें ऐसी बातों पर यकीन करना चाहिए जो इंसानियत को जोड़ती हों, न कि बांटती हों। एक मालिक की बंदगी और उसके बंदों की सेवा ही कामयाबी का असली रास्ता है।

​लेखक: गुलाम मुस्तफा

फाउंडर: हन्ज़ला फाउंडेशन