तक़वा और परहेज़गारी का महीना
रोज़ा सिर्फ सुबह सादिक से लेकर मगरिब तक खुद को खाने-पीने से रोके रखने का नाम नहीं है। रोज़े की असल रूह 'तक़वा' है। जिस तरह हम अल्लाह की रज़ा के लिए हलाल रिज़्क़ छोड़ देते हैं, उसी तरह हमें अपनी ज़बान को गीबत (चुगली) से, आँखों को बुरी नज़र से, और दिल को कीना-कपट से पाक रखना होता है। यह सब्र का इम्तिहान है, और अल्लाह फरमाता है कि 'रोज़ा मेरे लिए है और इसका अज़्र (इनाम) मैं खुद दूँगा।'
सहरी की बरकत और इफ्तार की रौनक
रात के आखिरी पहर में उठकर 'सहरी' खाने में जो बरकत और लज़्ज़त है, वो दुनिया के किसी और खाने में नहीं। वहीं जब मगरिब के वक़्त दस्तरख्वान सजता है, तो 'इफ्तार' का वो मंज़र दिलों में मोहब्बत भर देता है। दिन भर की शिद्दत की प्यास के बाद खजूर और पानी का पहला घूंट जो सुकून बख्शता है, वो एक रोज़ेदार ही महसूस कर सकता है। उस वक़्त मांगी गई हर दुआ अल्लाह की बारगाह में सीधे मक़बूल होती है।
कुरआन-ए-मजीद और तरावीह की रातें
रमज़ान की सबसे बड़ी फज़ीलत यह है कि इसी मुकद्दस महीने में कुरआन-ए-मजीद का नुज़ूल (अवतरण) हुआ, जो पूरी इंसानियत के लिए हिदायत है। रमज़ान की रातों में जब मस्जिदों से 'तरावीह' में हाफ़िज़-ए-कुरआन की तिलावत गूंजती है, तो ऐसा महसूस होता है जैसे ज़मीन पर अल्लाह की रहमतों की बारिश हो रही हो।
इंसानियत की खिदमत: हंज़ला फाउंडेशन का अज़्म
रमज़ान का सबसे बड़ा पैग़ाम 'हमदर्दी' और 'इंसानियत' है। दिन भर की भूख और प्यास हमें उन यतीमों, मिस्कीनों और बेवाओं की तकलीफ का एहसास दिलाती है, जिन्हें दो वक़्त की रोटी मयस्सर नहीं। यही वह जज़्बा है जो 'हंज़ला फाउंडेशन' की बुनियाद है—"इंसानियत की एक पहचान"।
इस मुकद्दस महीने में ज़कात और सदक़ा-ए-फित्र अदा करने का खास हुक्म है, ताकि समाज का हर तबका ईद की खुशियों में शामिल हो सके। सखावत (दान-पुण्य) का सवाब इस महीने में सत्तर गुना तक बढ़ा दिया जाता है। हंज़ला फाउंडेशन का भी यही मक़सद है कि रमज़ान की इन बरकतों को आम किया जाए और ज़रूरतमंदों तक मदद पहुँचाकर इंसानियत का हक़ अदा किया जाए।
रमज़ान सिर्फ 30 दिन का मेहमान होता है, लेकिन यह जो ज़िंदगी गुज़ारने का सलीक़ा, सब्र और अख़लाक़ का दर्स दे जाता है, वो पूरा साल हमारी रहनुमाई करता है। अल्लाह ता'आला से दुआ है कि इस बरकत वाले महीने में वो हमारी तमाम इबादतों और खिदमत-ए-खल्क (जनसेवा) को कुबूल फरमाए, हमारे गुनाहों की मग़फ़िरत फरमाए और पूरी दुनिया में अमन-ओ-अमान और भाईचारा कायम करे।
आमीन सुम्मा आमीन!
आप सभी को रमज़ानुल मुबारक!
दुआग़ो:
हंज़ला फाउंडेशन
(इंसानियत की एक पहचान)

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