बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम

Hanzala Foundation

अस्सलाम अलैकुम व रहमतुल्लाहि व बरकातहू!

प्यारे इस्लामी भाइयों, बहनों और बुजुर्गों,

ज़िंदगी पानी के एक बुलबुले की तरह है, जो न जाने कब खत्म हो जाए। हम इस दुनिया में एक मुसाफिर की तरह आए हैं और हमारा असली घर 'आख़िरत' है। लेकिन इस छोटे से सफर में हम जो कुछ भी बोते हैं, वही कल रोज़-ए-महशर (कयामत के दिन) हमारी निजात (छुटकारे) का ज़रिया बनेगा। इसी फिक्र, इसी दर्द और इसी एहसास का दूसरा नाम है— Hanzala Foundation (हंज़ला फाउंडेशन)

ज़िंदगी का असल मक़सद क्या है?

अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने इंसान को 'अशरफुल मखलूकात' (तमाम मख्लूक में सबसे अफज़ल) बनाया है। लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि हमें यह रुतबा क्यों मिला? सिर्फ अपने लिए जीने, कमाने और दुनियावी ख्वाहिशों को पूरा करने के लिए? नहीं!

"दर्द-ए-दिल के वास्ते पैदा किया इंसान को,
वरना ताअत (इबादत) के लिए कुछ कम न थे कर्र-ओ-बयाँ (फ़रिश्ते)।"

Hanzala Foundation का क़याम

आज के इस दौर में जहाँ हर इंसान अपनी उलझनों में गिरफ्तार है, Hanzala Foundation ने यह बीड़ा उठाया है कि हम उन सिसकती हुई आवाज़ों को सुनेंगे जिन्हें दुनिया अनसुना कर देती है। हम चाहते हैं कि:

  • किसी भी यतीम को यह महसूस न हो कि उसका इस दुनिया में कोई सहारा नहीं है।
  • कोई भी गरीब और लाचार इंसान इलाज के अभाव में दम न तोड़े।
  • किसी भी मजबूर के घर का चूल्हा सिर्फ इसलिए न बुझे क्योंकि उसके पास पैसे नहीं हैं।

सदक़ा-ए-जारिया: वो नेकी जो ज़िंदा रहती है

नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का फरमान है कि इंसान के मरने के बाद भी तीन चीज़ों का सवाब मिलता रहता है:

  • ऐसा इल्म जिससे लोगों को फायदा पहुँचे।
  • नेक औलाद जो उसके लिए दुआ करे।
  • सदक़ा-ए-जारिया (वो दान जिसका फायदा लंबे समय तक मिलता रहे)।

आइए, इस नेकी के कारवाँ का हिस्सा बनें

इस रूहानी सफर में हमें आपके साथ, आपकी दुआओं और आपके तआवुन (सहयोग) की सख्त ज़रूरत है। अगर आप खुद किसी गरीब की मदद नहीं कर पा रहे हैं, तो कम से कम Hanzala Foundation के इस पैगाम को दूसरों तक पहुँचाएं।

आपका भाई,
गुलाम मुस्तफा
(संस्थापक, Hanzala Foundation)