बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम

Hanzala Foundation

अस्सलाम अलैकुम व रहमतुल्लाहि व बरकातहू!

प्यारे इस्लामी भाइयों, बहनों और बुजुर्गों,

अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने दुनिया को एक इम्तिहान की जगह बनाया है। वह किसी को माल-ओ-दौलत देकर आज़माता है, तो किसी को गरीबी और मुफ़लिसी देकर आज़माता है। असल कामयाबी इसमें नहीं है कि हमने दुनिया में कितनी दौलत जमा की, बल्कि कामयाबी इसमें है कि हमने अल्लाह की दी हुई नेमतों से मख्लूक-ए-खुदा (अल्लाह के बंदों) की कितनी मदद की।

"करो मेहरबानी तुम अहल-ए-ज़मीं पर,
खुदा मेहरबां होगा अर्श-ए-बरीं पर।"

क्या हम अपना फ़र्ज़ निभा रहे हैं?

ज़रा सोचिए, जब हम अपने घरों में बेहतरीन खाना खा रहे होते हैं और सुकून की नींद सोते हैं, तो क्या हमें उस बेसहारा और यतीम बच्चे का ख्याल आता है जो शायद भूखे पेट सो रहा हो? इस्लाम हमें सिर्फ इबादत करना नहीं सिखाता, बल्कि इंसानियत से मोहब्बत करना और उनका दर्द बाँटना भी सिखाता है। नमाज़ और रोज़े के साथ-साथ, गरीबों और बेसहारों की मदद करना भी हमारे दीन का एक बेहद अहम हिस्सा है।

आपकी एक नेकी, किसी की नई ज़िंदगी

Hanzala Foundation का मकसद उन अंधेरों में चिराग जलाना है, जहाँ लोगों की उम्मीदें टूट चुकी हैं। हम कोई बहुत बड़ा दावा नहीं करते, लेकिन यकीन मानिए आपकी एक छोटी सी मदद किसी के लिए दुनिया की सबसे बड़ी नेमत बन सकती है:

  • किसी भूखे इंसान को एक वक्त की इज़्ज़त की रोटी मिल सकती है।
  • किसी बीमार और लाचार को शिफा के लिए दवा मिल सकती है।
  • किसी बेवा (विधवा) बहन के घर का चूल्हा जल सकता है।
  • किसी यतीम बच्चे के मासूम चेहरे पर मुस्कान आ सकती है।

صدقہ بلاओं को टालता है (Sadaqah)

याद रखिए, अल्लाह की राह में सदक़ा (दान) देने से माल कभी कम नहीं होता, बल्कि यह आने वाली मुसीबतें और बीमारियों को टाल देता है, और रिज़्क (रोज़ी) में सत्तर गुना ज़्यादा बरकत लाता है।

रहम दिल बनें, इंसानियत चुनें

आइए, अल्लाह की रज़ा के लिए इस नेक काम में हमारे कदम से कदम मिलाकर चलें। अगर आप अपनी तरफ से माली मदद (Financial Help) नहीं कर पा रहे हैं, तो कम से कम Hanzala Foundation के इस पैगाम को अपने दोस्तों और रिश्तेदारों तक पहुँचाएं। आपका एक 'शेयर' भी सदक़ा-ए-जारिया बन सकता है।

दुआओं का तालिब, आपका भाई,
गुलाम मुस्तफा
(संस्थापक, Hanzala Foundation)