Hanzala Foundation
प्यारे इस्लामी भाइयों, बहनों और बुजुर्गों,
हम अक्सर अपनी नमाज़ों, रोज़ों और इबादतों की तो बहुत फिक्र करते हैं, जो कि 'हुक़ूक़-उल्लाह' (अल्लाह के हुकूक) हैं। और यह ज़रूरी भी है। लेकिन क्या हम 'हुक़ूक़-उल-इबाद' (बंदों के हुकूक) को भूल नहीं गए हैं? रोज़-ए-महशर (कयामत के दिन) अल्लाह अपने हुकूक तो शायद मुआफ़ कर दे, लेकिन बंदों के हुकूक तब तक मुआफ़ नहीं होंगे जब तक कि वो बंदा खुद आपको मुआफ़ न कर दे।
अल्लाह की मदद किसे मिलती है?
हदीस शरीफ़ का मफ़हूम है: "अल्लाह अपने बंदे की मदद उस वक़्त तक करता रहता है, जब तक बंदा अपने भाई की मदद में लगा रहता है।" अगर हम चाहते हैं कि हमारी मुश्किलों में अल्लाह हमारी गैब (अदृश्य) से मदद फरमाए, तो हमें ज़मीन पर मौजूद लाचारों और मजबूरों की मदद करनी होगी।
जो मख्लूक़-ए-खुदा से प्यार करता है।"
हमारा विज़न और हुक़ूक़-उल-इबाद
Hanzala Foundation इसी हुक़ूक़-उल-इबाद की अदायगी का एक ज़रिया है। इस दुनिया की भाग-दौड़ में हम उन लोगों को पीछे छोड़ देते हैं जो सहारे के मोहताज हैं। हमारा मिशन है:
- भूखों को खाना खिलाना, जो कि इस्लाम में सबसे बेहतरीन सदक़ा माना गया है।
- बीमारों और कमज़ोरों की देखभाल करना, ताकि कोई बेबसी में दम न तोड़े।
- यतीमों के सिर पर हाथ रखना, जिसके बदले जन्नत की बशारत (खुशखबरी) दी गई है।
कल का इंतज़ार न करें
शैतान हमेशा इंसान को नेकी करने से रोकता है और उसे कल पर टालने का वसवसा (खयाल) डालता है। लेकिन हमें नहीं पता कि यह साँसें कब तक हमारा साथ देंगी। जो नेकी आज कर ली, वही हमारी है। जो माल आज अल्लाह की राह में खर्च कर दिया, वही असल में हमारा बैंक बैलेंस है जो आख़िरत में काम आएगा।
इस मुकद्दस काम में हमारे हमसफ़र बनें
हम अकेले इस बड़े ज़िम्मे को पूरा नहीं कर सकते। कल्याण और आस-पास के हर ज़रूरतमंद तक पहुँचने के लिए हमें आपके साथ की ज़रूरत है। अगर आप खुद कुछ नहीं कर पा रहे हैं, तो कम से कम Hanzala Foundation के इस पैगाम को आगे बढ़ाएं, क्योंकि नेकी का रास्ता दिखाने वाला भी नेकी करने वाले के बराबर सवाब पाता है।
दुआओं का तालिब, आपका भाई,
गुलाम मुस्तफा
(संस्थापक, Hanzala Foundation, कल्याण)
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