नेकी कर दरिया में डाल
नेकी कर दरिया में डाल

नेकी कर दरिया में डाल

सद्क़ा-ए-ख़फ़ी और ख़ुलूस-ए-नियत का अज़ीम मर्कज़

नेकी कर दरिया में डाल"—यह महज़ एक कहावत नहीं, बल्कि हयात का एक मुकम्मल फलसफा है। इसका गहरा मफ़हूम यह है कि जब आप किसी के साथ कोई भलाई करें, तो उसे इस तरह फरामोश (भूल) कर दें जैसे बहते हुए दरिया में कोई पत्थर डाल दिया गया हो।

"हज़रत मुहम्मद ﷺ ने फ़रमाया: जब तुम सद्क़ा दो, तो ऐसे छिपाकर दो कि तुम्हारे बाएं हाथ को ख़बर तक न हो कि तुम्हारे दाएं हाथ ने क्या ख़र्च किया।"
— सहीह बुखारी

इस्लाम की रूह हमें यही तालीम देती है कि हमारी नेकियों का मकसद दुनियावी शोहरत या सिले (बदले) की उम्मीद नहीं, बल्कि महज़ अल्लाह की ख़ुशनूदी (रज़ा) होनी चाहिए। जब हम नेकी करके उसे लोगों के सामने बयान करते हैं, तो वह 'रियाकारी' (दिखावा) बन जाता है, और जब हम उसे फरामोश कर देते हैं, तो वह ख़ालिस 'इबादत' बन जाती है।

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कुरान-ए-मजीद में परवरदिगार फरमाता है कि बेहतरीन इंसान वो हैं जो महज़ अल्लाह की मोहब्बत के लिए खाना खिलाते हैं और कहते हैं कि "हम तुम से न कोई सिला चाहते हैं और न ही शुक्रगुज़ारी।" यही वह मक़ाम है जहाँ इंसान का नफ़्स पाक हो जाता है।

याद रखें, जो सद्क़ा दुनिया की नज़रों से छुपकर दरिया में बहा दिया गया, उसका अज़्र रब्ब-ए-ज़ुल-जलाल अपने अर्श पर महफ़ूज़ रखता है।